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पहली कहानी:  

लम्बरूराम की टैक्सी
झाकड़ी स्थित एसजेवीएन की टाऊनशिप के हृदय स्थल में खड़े 64 वर्षीय लम्बरूराम संतुष्ट नजर आते हैं। उन्होंने अपनी अपनी आंखों से एसजेवीएन नाम की संकल्पना को प्रस्फुटित होकर फिर विकसित होते हुए देखा है और वे खुद को इसकी सफलता की जीती-जागती तस्वीर मानते हैं। उनकी कहानी एक निगम और एक जलविद्युत परियोजना के बनने से स्थानीय लोगों के जीवन में आए सुखद बदलावों की दास्तां बयान करती है।

अव जहां एसजेवीएन की परियोजना अवस्थित है, वहां (धार गौरा) के लम्बरूराम 1973 से 1987 के 14 वर्षों में से 11 वर्षों तक पंचायत प्रधान रह चुके हैं। वे 1995 में भी प्रधान चुने गए और इस पद पद 2000 तक, पंचायत को गोपालपुर, झाकड़ी एवं धारगौरा की तीन ग्राम पंचायतों में बांटे जाने तक रहे। लेकिन तब राजनीतिक माहौल के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक माहौल भी काफी बदल चुका था।

शुरू से ही लम्बरूराम धारगौरा और इसके ईर्द-गिर्द के क्षेत्र में जलविद्युत परियोजना बनाने की योजना के हिमायती थे। वे याद करते हैं कि "इससे उनका जीवन बदल सकता हैं"। एक किसान के तौर पर लम्बरूराम के पास 48 बीघे जमीन थी, जिस पर वे "मक्की, गेहूं और प्लम" उगाते थे और उन्हें लगभग 150 बकरियां और गाएं पाल रखी थी। एसजेवीएन के अधिकारियों ने लम्बरूराम की 46.5 बीघे जमीन अधिग्रहित की। हालांकि, इसके लिए उन्हें पर्याप्त राशि "1991 में यह रु. 24,000 प्रति वीघे" प्रदान की गई। कुल मिलाकर जिन परियोजना प्रभावित परिवारों को अपनी संपत्ति गंवानी पड़ी, उन्हें एसजेवीएन ने रु. 12.3 करोड़ की प्रतिपूर्ति राशि प्रदान की।

वे "भूमिहीन" अधिघोषित किए जाने के फलस्वरूप पुनर्वास पैकेज के प्रावधानों के अनुसार और अधिक सहायता प्राप्त वे हेतु पात्र थे। प्रतिपूर्ति संबंधी मानकों के अनुसार अधिक्रहण प्रक्रिया के बाद जिन परिवारों के पास पांच बीघे से कम जमीन बची है उन्हें आधिकारिक तौर पर "भूमिहीन" माना गया है। अधिग्रहित भूमि के लिए उन्हें अदा की गई नकद प्रतिपूर्ति राशि के अतिरिक्त भी परिवार को वैकल्पिक भूमि भी दी जानी थी, जिससे अंतत: उनके पास पांच बीघे जमीन हो जाए। यदि मकान भी अधिग्रहित हुआ था तो उसके एवज में मकान दिया जाना था।

यदि यह सब उलझावपूर्ण लग रहा है तो जरा लम्बरूराम के मामले पर गौर करें। उनके पास मूल 48 बीघे में से मात्र 1.5 बीघे जमीन बची थी। परिणामत: उनकी भूमि धारिता 5 बीघे करने के लिए एसजेवीएन अधिकारियों ने 3.5 बीघे अतिरिक्त जमीन खरीदकर उन्हें दी। एसजेवीएन ने धारगौर एवं अन्य गांवों के जिन 480 परिवारों की भूमि अधिग्रहित की थी, उनमें से 112 परिवार "भूमिहीन माने गए" जिन्हें अतिरिक्त संलाभ प्रदान किए गए।

परियोजना के शुरूआती दौर में ही, तब कालोनी विकसित होने लगी और परिवार रहने के लिए आने लगे, लम्बरूराम ने छोटे, खुदरा कारोबार पनपने के मौके भांपकर इसी पांच बीघे जमीन पर अपने पारिवारिक मकान सहित अपनी परचून की दुकान खोली।

लम्बरूराम ने अधिग्रहित 46.5 बीघे जमीन एवज में मिली राशि में से और अधिक कृषि भूमि खरीदी। वे कहते हैं "झाकड़ी से दूर ऊपर की ओर सस्ती जमीन उपलब्ध थी, मैंने उस जमीन में पैसा लगाया और आज किसान वहां गेहूं और फल उगाते हैं और मुझे किराया देते हैं"।

ऐसा नहीं है कि ये दुकान और कृषि भूमि ही सब कुछ है। पुनर्स्थापन श्रेणी के परिवारों को रोजगार प्रदान करने की योजना के तहत लम्बरूराम के लड़कों में से एक को एसजेवीएन में क्लर्क की नौकरी दी गई। वह उन 61 परियोजना प्रभावित परिवारों में से एक है, जिन्हें एसजेवीएन ने पक्की नौकरी दी है।

प्रतिपूर्ति की राशि में से लम्बरूराम ने अपने दूसरे लड़के के लिए बोलेरो युटीलिटी वाहन खरीदा। स्थानीय टैक्सीधारकों को प्रोत्साहित करने की योजना के तहत यह वाहन एसजेवीएन में किराए पर लगा हुआ है, जिसे लम्बरूराम का लड़का चलाता है। पिता का कहना है कि इससे 15000/- रुपए प्रति माह की शुद्ध आमदनी होती है।

तीसरा लड़का भी एक प्रकार से बड़े एसजेवीएन परिवार का हिस्सा है। मेजबान समाज के विकास के लिए एसजेवीएन परियोजना प्रभावित परिवारों की खातिर सकारात्मक भेदभाव की नीति के प्रति वचनबद्ध है, जिसके तहत डंगा बनाने या छोटे मरम्मत के कार्यों के लिए मसलन रु. 3 लाख के मूल्य से कम राशि के छोटे-मोटे ठेके उन्हें अवार्ड किए जाते हैं। लम्बरूराम के कनिष्ठ पुत्र इसी तरह का एक ठेकेदार है।

अपने बच्चों को बसाने (जैसा वे कहते हैं), "कच्चे" घर से "पक्के" घर में जाने और लघु कृषि समाज से चहल-पहल भरे शहरी सामुदायिक जीवन में प्रवेश करने के बाद लम्बरूराम जिस परिवर्तनों के साक्षी हैं उन्हें वे चमत्कारिक प्रतीत होते है। वे कहते हैं कि "एसजेवीएन ने गांवों से कितने ही व्यक्तियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार मुहैया करवाया है। लोगों को रोजगार मिला है, उन्होंने दुकानें और छोटा कामकाज खोला है, रु. 3 लाख से कम राशि के ठेके प्राप्त किए हैं। बड़े ठेकेदारों तक ने स्थानीय एवं परियोजना प्रभावित परिवारों के व्यक्तियों को नौकरियां दी हैं। यह बाहर से श्रमिक लाने के बजाए आसान है।"

इस बदलाव के सबूत के तौर पर लम्बरूराम अपने दुकान से ऊपर की ओर एसजेवीएन द्वारा उन परियोजना प्रभावित लोगों को बसाने के लिए बनाई गई पुनर्वास कालोनी की ओर इशारा करते हैं, जो "भूमिहीन" होकर अपना घर गंवा चुके थे और जिन्हें रहने के लिए नई जगह दरकार थी। मकानों हेतु पात्र 112 परिवारों से 21 को नई बस्ती में वास्तविक रूप से मकान दिए गए हैं। बाकी 29 परिवारों (उनमें से एक लम्बरूराम भी) ने इसकी एवज में नकद रु. 45,000/- लेकर वैकल्पिक व्यवस्थाएं की हैं। उन्होंने प्रतिपूर्ति राशि में से कुछ राशि खर्च करके शायद और भी बड़े मकान बनाएं हैं।

दो पंक्तियों में स्वच्छता से फैले 21 मकान किसी बड़े शहर में विकसित रिहायशी पड़ोस सरीखे दिखते हैं। उनमें से प्रत्येक में एक रसोई और एक गुस्लखाना है और पेय जल सुविधा भी है। एक निवासी का कहना है कि "पहले हमारे घरों तक पानी नहीं आता था। हमें गांव के बाहर स्थित एक साझे जल स्रोत का सहारा था। अब ये बातें नहीं रहीं। कुछ गुस्लखानों में वाशिंग मशीनें, रसोईयों में एलपीजी सिलेण्डर और कुकिंग स्टोव हैं। एसजेवीएन द्वारा लाई गई संपन्नता इन लघु विवरणों में साफ झलकती है और फिर लम्बरूराम क्यों न खुश हों।


दूसरी कहानी: 

एसजेवीएन के साथ पढ़ाई
परियोजना प्रभावित परिवारों से मिलने पर यह जानकर हैरानी होती है कि नाथपा झाकड़ी परियोजना से उनको पहुंचे लाभों से ज्यादा महत्व उनके लिए इस बात का है कि परियोजना के बनने से उनके बच्चों के जीवन पहुंचे लाभों से ज्यादा महत्व उनके लिए इस बात का है कि परियोजना के बनने से उनके बच्चों के जीवन बेहतर हुए है। सड़क द्वारा शिमला से सात घंटे तक लेने वाला पर्वतीय इलाका एसजेवीएन के सौजन्य से हि.प्र. में शिक्षा के सर्वोत्तम केन्द्रों में से एक केन्द्र बन गया है।

700 छात्रों वाला झाकड़ी स्थित सीनियर सेकेण्डरी स्कूल एक छोटे एवं मामूली से भवन में अवस्थित था। परियोजना की संकल्पना के समय किए गए वायदे के अनुसार एसजेवीएन द्वारा स्कूल के लिए 52 लाख रुपए की अनुदान राशि दिए जाने और स्कूल का पुनरूद्धार किए जाने के फलस्वरूप इसका कायाकल्प हो गया है। स्कूल का नया भवन, नए ब्लैकबोर्ड एवं शिक्षा सामग्री, नया मैदान एसजेवीएन द्वारा दिए गए वचन को पूरा किए जाने के गवाह है।

इससे भी बढ़िया दिल्ली पब्लिक स्कूल, झाकड़ी है जो पूर्णतः एसजेवीएन की पहल एवं धैर्य का परिणाम है। इस स्कूल में बेहतरीन पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला हैं जिनकी तुलना भारत के सर्वश्रेष्ठ स्कूलों से की जा सकती है। स्कूल का सकूनभरा लैण्डस्केप है और यहां पड़ोसी शहरों जैसे रामपुर तक से छात्र पढ़ने आते हैं।

इस स्कूल की स्थापना 1994 में हुई। श्रीमती तनु बंसल, जिन्होंने यह स्कूल 1995 में ज्वाइन किया था, कहती हैं, "उस समय इस स्कूल में हम 12 अध्यापक एवं 200 बच्चे थे।" आज हम 32 अध्यापक एवं 600 छात्र हैं। असल में 670 छात्र हैं - 60% एसजेवीएन टाऊनशिप से और 40% बाहर से हैं. उल्लेखनीय है कि 670 में से 211 छात्र परियोजना प्रभावित परिवारों से हैं।

निगम परियोजना प्रभावित बच्चों की शिक्षा के लिए सब्सिडी देता है। उदाहरणतः, दसवीं कक्षा में परियोजना प्रभावित परिवारों सहित एसजेवीएन से संबंधित छात्र 360/- रुपए प्रति माह और अन्य 650/- रुपए प्रति माह की फीस अदा करते हैं। एसजेवीएन ने स्कूल के शुरूआती निर्माण पर रु. 2 करोड़ खर्च किए थे। वर्तमान स्कूल को "सहायता अनुदान" दिया जाता है जो पिछले वर्ष रु. 62 लाख था।

डीपीएस (झाकड़ी) का पांच एकड़ का विस्तृत कैम्पस है। स्कूल में पी.सी. से लेकर स्वच्छ क्लासरूम और आडोटोरियम है और यहां के लोगों की पहुंच में यह बेहतरीन स्कूल है। यह स्कूल पर्यावरणीय रूप से भी संवेदनशील है। स्कूल के खेल के मैदान के निर्माण के लिए नाथपा में बांध के निर्माण के समय निकली मिट्टी उपयोग की गई है। इस मैदान के नीचे की परत "बनाने" के लिए इसमें मलबा भरा गया है।

   

सर्वाधिकार सुरक्षित एसजेवीएन लिमिटेड